"मिट्टी में मिल जाना है एकदिन"


मिट्टी के पुतले है सब 
मिट्टी में मिल जाएगे,
ना कर घमंड तेरा भी पल आएगा 
कौन रहा है जग में जो तू रह पाएगा ।

सब यश-कीर्ति  इसी भू का है
जो पाया है यही से पाया है, 
सब यही छोड़कर जाएगा 

ना कर घमंड तू ए बंदिया, 
सब एकदिन खाक ही मे मिल जायेगा।

ठहर कर सोच जड़ा कुछ बीते लम्हो को
कितने ही धुरंधर चले गए, 
अपनी पहचान बनाकरके
किस बात कि तुझको अकड़ है बंदिया, 
सब खेल है मिट्टी का मिट्टी में ही
मिल जाना है एकदिन।

ये माया -मोह की नगरी हैं 
सब रिश्ते -नाते है रास रचाने को, 
तू कर्म पथ पर बढ़ता जा 
तू कर्म सत्यनिष्ठ करता जा ।

ना सोच कि सब मेरा है
ना लालच को अतिशय बढ़ने दे, 
उतना ही कमा जो मिटा दे तेरी
भूखो को, जरूरत को, दायित्वों को।

ना छीन किसी के कर्मो का फल
ना रूला किसी दीनहीनो को, 
ये कर्मफल का चक्री है बंदिया,
वापस एकदिन लौट के आना है ।

ना लालच-मोह में पर बंदिया 
ये माया -मोह की नगरी है, 
सब स्वर्ग -नर्क इसी धरती पर
इतिहास रच के जा धरती से
पहचान बनाकर कर जा बंदिया 
मिट्टी के ही पुतले है सब, 
एकदिन मिट्टी मे मिल जाएंगे ।।

                     प्रीति कुमारी 




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