इसमे एक खुशी एक गम के करीब है ,
हर वक्त चलती केवल तेरी फरमाईसे,
जब चाहे जिसे चाहे बना ले अपनी हसरते।
हूँ अंचम्भित सोच के हर धड़ी
तूने ही दिये हर रिश्ते अनमोल,
तुम्ही इसे छीनते हो, क्या चाहते हो
क्यो ले जाते हो अपनो को
क्या कोई और जहाँ बनाए हो कही
जिसमे अपनो को बसाते हो धड़ी हर धड़ी।
आज बोल रहा, कल चुप हो जाउंगा
कोई नहीं जानता कब चला जाउंगा,
बेसक बहुत यादे छोड़ जाउंगा,
कमी मेरी हर वक्त खलेगी सबको,
चाहुगा शायद पर फिर भी आ नही पाउंगा।
हर जाने वालो की यही कला है
या खुदा तूने कैसी बेबसी में ढ़ाला है,
एक अनमोल रिश्ता बनवाता है,
फिर अपनो को अपनो से ही जुदा करवाता है ।
बड़ी शिकायत हैं ये खुदा तुझसे
मिले कभी तो ब्या करू,
क्या ये जहाँ खुबसूरत नहीं
या तेरी परम्परा का ये जाल है
तू बसाता है अपनो से छीन के
एक जहाँ अपनो सा।
शिकायते है आपसे, मिले कभी तो ब्या करू
छीने हुए अपनो से दे एक मौका जो मिलू कभी,
ना छोड़ बेबस इस जहाँ मे ये खुदा
बड़ी खलती है कमी, उस प्यार की,
या तो ना दे कोई संबंध, या तो ना छीन किसी धड़ी
बदल दे अपनी परम्परा,
दे एक मौका जो मिल सकू किसी धड़ी
कमी ना खले अपनो की,एक रहे आस हर धड़ी
या खुदा तेरी दुनिया अजीब है ।
प्रीति कुमारी

4 टिप्पणियाँ
Nice
जवाब देंहटाएंNice 👌👌👌👌
जवाब देंहटाएंसच्ची बात बिलकुल।
जवाब देंहटाएं👍 ati sundar
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