चेतना शून्य खड़ी है वो,
हर जख्म को दिल में दबाये हुए,
एक पुत्री ने है पिता का मान रखा।
बड़े लार- प्यार से पली बढ़ी
कुछ सीख सकी ना दायित्वों को,
माँ -बाप की लाडली गुड़िया थी,
हर वक्त रही ऐशो आरामो में ।
ब्याह हुई कई सपनो संग
वैसे ही जिउंगी जैसे जिती थी,
पर अफसोस की ये ससुराल है,
दायित्वों से, मर्यादाओं से भरी हुई ।
होगी हजारो गलतियां
हर हाल में इसे सुधारेगी,
जड़ा साथ निभा देना तुम,
है वचन लिया तुमने सात-फेरो में ।
ये पुत्री नहीं बहु है घर की
हर बात में कमी दिखेगी सबको,
चाहे हाल समय का जैसा हो,
चाहे कमी हो लाखो ही इसमे
तुम हर वक्त निभाना साथ इसका
तुम ही से तो जुड़ा है संबंध अडिग ।
रानी बनके पलने वाली
हर मोड़ पे कष्ट उठाती है,
ये सिंदूर की मर्यादा को,
जान न्योछावर करके भी निभाती है
एक पति के विश्वास पे मायका छोड़ जाती हैं ।
प्रीति कुमारी

7 टिप्पणियाँ
Very nice
जवाब देंहटाएंSupper
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी कविता।👍👏
जवाब देंहटाएंbahot hi sunder
जवाब देंहटाएंThnx a lot everyone
जवाब देंहटाएंBahut hi sundar poitry
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर पंक्तियां लिखी हैं 💐💐🙏🙏
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