बेटी किसी को नहीं चाहिए पर बहु सबको चाहिए (ऐसे कैसे चलेगा चाचा)

🙏"कन्या शिशु हत्या "🙏


उजाले की शाम में ही,अंधकार घनघोर हुआ 
जिस पल घर में बेटी आई,
ना थाल बजी ना शोर हुआ
दादी जो माँ रूप है, भक्ति और घर्म परायण है 
बेटी की किलकारी सुन चीखी,
लड़का है या डायन है? 




घर के सारे लोगो ने माँ को कोसना शुरू किया 
मर जाती पर लड़का देती ये कहना सबने शुरू किया, 
अफसोस है उस मनहूस पल का
जब ये इस घर में आई थी, 
मर जाती तो अच्छा होता दुजी ब्याह के लाते हम।

माँ के पीहर और प्रभु को जी भरके सबने कोसा है
हैं केवल चलरहा सबके मुँह में 
इस करमजली ने,केवल पुत्री को ही जना है, 
दादा -बुआ, चाचा -ताउ, सब है विचार में परे
कैसे लगे ठिकाने बच्ची कि माहौल भी शांत रहे।

सब के मन में है चल रहा, 
क्या हो जो माँ ना सौपे बच्ची को,
ताउ तांव में आकर बोले 
क्या हुई अक्ल की कच्ची वो?

भाग्य लिखा है पहले से 
जबसे सबको पता चला की लड़की हैं 
खैर मनाओ की क्रोध की ज्वाला 
माँ पर अभी तक ना भड़की है ,
सब सोच रहे अनाथालय के दर पर 
या कूड़े में फेकने को, रोकेगी गर मां तो
वो भी जान से जाएगी ।

रोना है किस्मत में इसकी, क्यों चुप तु करा रही
पता है जब कि दूर है होना,तो क्यों दिल से लगा रही
माँ के कापंती हाथों से छीना गुड़िया को ताई ने
लेकर आई बाहर सौप दिया एक बाई को, 
दिये कुछ पैसे रूपये, इशारा कर आगे की राह बताई है 
ढकों की कोई सुन ना ले,इसके रूदन को कानों से।

लाचार खड़ी माँ देख रही, पर हिम्मत थी ना कुछ कहने की
भाग्य की खेल है सोचकर, आदत सी हो गई उसे सहने की
बाई सोचे जिंदा छोड़े दिया तो पकड़ी जाउंगी, 
जल में इसे डुबोउंगी या गला घोट दफनाउंगी। 

फिर वो नन्ही जान को ले गयी जंगल मे 
गला घोटते बोली, मर जा सब रहेगे मंगल मेैं 


गूँज रही चीखे मासूम की जंगल के बीचो-बीच में 
कोई ना सुन पाया होगा,ये सोच के मुँह को भींच रही,
कुछ पल में ही रोती, घुटती चीखें आखिर हार गई 
गड्ढा खोंद के वही दफन कर, बाई भी वहां से भाग गई,
कुछ इस तरह एक और कन्या चली गई  इस धरती से
माँ की ममता यादों में हैं पल-पल जलती मरती है ।

मैं उस घर का आने वाला वारिस देख रहा था सब अम्बर से
हो चकित फिर सोचा आखिर क्यों  जांउ मैं इस घर में ,
जिस घर की औरत ही औरत की कातिल हैं 
सम्मान नहीं जिस घर में औरत का 
वो घर, घर नहीं खून से सनी दीवारें हैं ।

जिस घर में लड़की को जन्म लेते ही मारा जाता हैं 
क्यों बनूं मैं उस घर का चिराग, 
क्यों बनूं पाप का भागी मैं, 
नहीं बनना मुझको मानव, जिसमें मानवता बची नहीं 
क्या वो घर भी कोई घर हैं जिसमे कोई कन्या पली नही ।

कन्या के जन्म लेते ही मौत के गोद सुला आते हो
हैरानी की बात है , हो जल्लाद भेष , फिर भी इंसान कहलाते हो, 
ऐसे घर की औरत जब एक ढ़ोग -स्वांग रचाती है 
अपने घर की बिटिया को मारकर, 
नौ दिन के उपवास के बाद कन्या भोज कराती है ।

दुर्भाग्य तुम सी औरत का है, जो केवल लड़का चाहती हो ,
पर सोचो अपनी कुंठित मानसिकता से परे हटकर
क्या होगा गर सब केवल लड़का ही पैदा करते जाए तो 
वंश बढाने की ख़ातिर फिर, बहु कहा से लाओगे।

बात ना वंश की है, ना ही केवल उपकारों की
औरत होकर कम- से -कम तुम तो समझो
लड़की भी इंसान हैं ,और ये बात है उसके अधिकारों की ।

🙏सोच बदले, और लड़का -लड़की में फर्क बन्द करे। 🙏

                                  प्रीति कुमारी 

                 














एक टिप्पणी भेजें

4 टिप्पणियाँ