मुझे तेरे आँगना ही रहना है बाबुल (मन मौन हो है बोल रहा)

भेज तो रहे हो बाबुल, क्या मान मिलेगा मुझे उस आँगना
मेरे मन में बहुत सी कसमकस थी चल रही
बेचैन मन से सुर्क जोड़े में सजी मैं
हर किसी को थी निहार रही
कोई तो रोक लो ये सब
मुझे जाना ही नहीं बाबुल तेरे आंगन से ।


एक तो मुझे जाना ही नहीं बाबुल
उसमे भी ये वर अनजाना है
ये तो मुझे पसंद ही नहीं बाबुल
कैसे कटेगा पूरा जीवन इस संग।

हर वक्त तैस दिखाएंगा
धड़ी -धड़ी मुझे ही दबायेगा
चाहुंगी बाबुल तुमसे मिलना हर पल
पर एक भी दिन मिलने आने पर
हो -हल्ला मचाऐगा।

हर अहमियत अपने मां-पिता,
भाई -बहन अपने रिश्ते को देगा
मेरे रिश्तो को ठुकरायेगा
खुद अपनी माँ के पास रहेगा
मुझे मेरी माँ से मिलने को तड़पायेगा
ना भेजो मुझे बाबुल, मुझे जाना ही नहीं ।

हर काम करूंगी उस के घर
पर उस काम को ना अहमियत देगा
बात -बात पर नीचा मुझे दिखाएंगा
और माफी मुझसे ही मंगवाएंगा
रोक लो बाबुल इसी आँगन,
नहीं जाना किसी के आँगन मुझको ।

एक तो मुझको पसंद नही
केवल आपकी इज्जत के लिए
सारी उम्र उसका साथ निभाउंगी
अपनी मान प्रतिष्ठा को बलि चढ़ा
अपने अरमानो को धोटकर
कुल की मर्यादा के खातिर
जीवन भर उसके घर का मान बढाउंगी।

बाल अवस्था पाल लिये 
क्यो युवा अवस्था भारी है
अपने गुड़िया का दान करके बाबुल
केवल इस प्रथा को हो जीवित रखते।

प्यार ना मिलेगा बाबुल आँगन सा 
मान ना मिलेगा बाबुल आँगन सा
जाते ही कमिया गिनाना शुरू होगा 
केवल  प्रथा के ख़ातिर, 
दान करो बाबुल कन्या अपनी 
पर मुझे जाना ना है  बाबुल 
किसी आँगन तेरे आंगना से
बस यही मौन में था चल रहा 
सजी थी सुर्क जोड़े में 
पर एक भय था मन में रौंद रहा।

                                 -प्रीति कुमारी 


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