उपलब्धता से भरपूर हूँ
इमारते ऊँची -ऊँची तनी खड़ी
शोर सराबो से सरा-बोर हूँ
हाँ मैं शहर हूँ ।
उम्मीदे सबकी पूरी करूं
सपने मेहनत से साकार हो
मिले सपनो की मंजिल
ऊंचे सोच -विचार हो।
गाड़ियों की आवाज़ मे गुम
भीड़-भाड़ का ना सहूर हैं
कोई भी खाली ना मिले
यहाँ अपनो से भी अपने दूर हैं
हाँ मैं शहर हूँ ।
ऊँचा -नीचा भेद -भाव से दूर हूँ
शोर सराबा -प्रदूषण से
जूझ रहा मजबूर हूँ
साफ -सफाई हर दम होती
पर पौधों की कमी भरपूर हैं ।
जितने ऊंचे मंजिले इमारत
उतने ही कट रहे पौधों के छाये
जितनी सुविधा मिले यहाँ
उतना ही मुश्किल बढती जाए
भीड़ भारी, प्रदूषण भारी
अपनो से दूर सपनो की दुनिया हूँ ।
कुछ कुल हूँ ,कुछ प्रतिकूल हूँ
कुछ अनुकूल, समाधानो से भरपूर हूँ
हाँ मैं शहर हूँ ।
प्रीति कुमारी

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Supper
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