विवाह मंगलमय हो

बिटियां चाँद सी है
दमाद हीरे सा लाउंगा
सजी अरमानो कि द्वार मन में 
पिता गुमसम सा बैठा था ।

पिता कि सोच थी अटकी
धड़ी उस धड़ी की आने की
फर्क नहीं था उसे एक जरा भी
अपनी जीवन की सारी पूंजी उड़ जाने की।

पढ़ा लिखाकर ,कुछ लायक बनाकर
उसे भेजना था अपने घर से
जो गोद में कभी खेली थी बैठकर



दर्द तो गहरा होगा, जो कोई समझ ना पाएगा।

कैसे भेजूंगा उसको,
जो आज भी बच्ची है मन से
कैसा सम्मान मिलेगा उसे
क्या उसका ससुराल उसे मानेगा।

जीवन भर की कमाई लूटा देने पर भी
बेचैन है पिता का मन,
बार -बार वो देख रहा वर को
और मन ही मन था सोच रहा

क्या सही चुना है ना मैंने इसे
अपनी प्यारी लाडली के लिए ।
बिटियां चाँद सी है
दमाद हीरे सा लाउंगा
                               -प्रीति कुमारी 


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