इस जहाँ के जनाब
लोग भाव भी देते हैं तो
भाव लगाकर देते हैं ।
बेफिक्र तो बचपन था
बिना स्वार्थ के रिश्ते थे
जवानी तो जालीम हैकई जालो के बने धेड़े हैं
अपने भी अपनापन नहीं दिखाते
जब पद औहदा छोटी हो
सब बात ठहर जाती हैं
औकात और हैसियत जब छोटी हो।
मान यहाँ धन का
सम्मान केवल पद का हैं
तभी तो अमीरों के अपने बहुत हैं
गरीबों के अपने भी अपने नहीं ।
रूबरू तो हम हुए हैं हालातो से
सच में लोग बदलते है हैसियत देखकर
वक्त भी नहीं होता अपनो के पास
जब चल रहा हो वक्त बूरा
और हालात खराब ,
बड़े महँगे जज़्बात हैं यहाँ जनाब ।
प्रीति कुमारी

1 टिप्पणियाँ
Nice
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