शायद अपने तरीके से जिये जा रही हूँ
ना जाने किस बात की
झूठी तस्सली दिये जा रही हूँ ।
उलझ गई हूँ दुनिया के झूठे दिखावे से
गमे इश्क़ का दर्द सहे जा रही हूँ
कभी अपना कभी पराया सा लग रहा है कोई
पर उसे ही अपना कहे जा रही हूँ ।
थम सी गई हैं ज़िंदगी
कभी पन्नो में, कभी यादों में
हो गर बाते तो बताउं उसे
उन्हीं यादो के सहारे जिये जा रही हूँ।
जो करना नहीं चाहती वो किये जा रही हूँ ।
प्रीति कुमारी

2 टिप्पणियाँ
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