खुली आंखें भी धोखा खा जाती हैं

इश्क की दरो दीवार पर
बदनाम हम हो गए
हम तुम में ,तुम मुझमें
गुमनाम हो‌ गए।

दर्द अपनो ने दिया था
शिकवा करते भी तो किससे
बारीकियाँ इतनी थी वेवफाई में कि
यकी आज भी नहीं कि वो वेवफा हैं ।


कुछ यादे आज भी रूलाती हैं
आती हैं पल में तन्हा कर जाती हैं
तुझपे यकीन इस कदर था मुझको
कि खुली आंखे भी धोखा खा जाती हैं ।

मैंने बुलाया ना था तुम्हें मेरी जिंदगी में
तुम खुद आये थे,जब दिल में बसा लिया मैंने
तुम्हारे भाव ही बढ़ने लगे
चलो अच्छा ही हुआ जो हुआ
वक्त से पहले ही
अपनी‌‌ औकात से वाकिफ कराने लगे।

कोई समझ ना सका‌
हमारी जज़्बातों , हालातों को
और हम‌ इन गलियों में,
जात-‌पात, धर्म में खो गए।

प्रीति ‌कुमारी





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