कोई आता ही क्यों है बिछड़ने के लिए

उसका आना भी उसकी मर्जी थी
उसका जाना भी उसकी ही मर्जी है
ना मैने तब रोका था, ना अब रोकूंगी
बस उसके आने और जाने में फर्क इतना है
उसका आना जितनी खुशी थी
जाना उतना ही गम दे रहा है ।


बात मुहब्बत की होती तो रोक लेते
जरा सी पहल अगर करता वो
तो दिल की हर बात कह देते
पर गम नहीं उसे जाने की
फिर क्या कहना जब उसे फर्क ही
नहीं पड़ता मेरे ना रह जाने की।

बात दौलत की है
सफलता और विफलता की है
पहचान नहीं है अपनी कुछ भी
तो हक भी नहीं है उससे मुहब्बत जताने की।

कौन सी नई बात है
तन्हाई की ही मेरी औकात है
बदला बस इतना सा है पल
कल तन्हाई अच्छी लगती थी
अब हर पल तेरी याद सताएगी।

तुम खुश रहो अपनी मन मर्जी में
हम तुम्हें अपनी याद कभी ना दिलाऐगे
कसूर किस्मत का है शायद
वरना ऐसे हालात ना होते
चाहते ही बिछर जाए कोई
इतना भी बेबस मुलाकात नही होते।


पहली बार बहुत बेबस सी हो गयी हूं
दर्द बहुत हैं दिल में पर कुछ ना कहूंगी
आऐगा और आ रहा रोना बहुत
पर रोउंगी नहीं,
ना कभी तुमसे अपने दर्द का इजहार करूंगी।




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