वो दिन भी आएगा

एक वो दिन भी आएगा
जब जहाँ में हम ना होगे
करेगे याद सब मुझको फिर
जैसा कर्म हम किये होगे।

व्यर्थ किसी को सताना क्या
किसी के हक की मार कर दबाना क्या
जो अर्धम जग में करेगे
उनका अंत भला होगा क्या।

ये जिंदगी एक रास है
जो मिले वो अपना
जो ना मिले वो ना भाग्य है
जो रचा है भाग्य में
उसे भोगने से कहा बचा कोई ।

सत्कर्म साथ जाएगा
सब धन यही रह जाएगा
एक कफन मिलेगा राह तक
श्मशान में वो भी छीन लिया जाएगा ।

कौन अपना, कौन पराया
सब मोह जाल का फांस है
जहाँ स्वार्थ की पूर्ति ना हो
हर रिश्ता वहा फिर नागवार है ।


जो भाग्य की भंगिमा में हैं
जो कर्म तेरे बस की है
कर उसे निस्वार्थ तू
ना कुछ तेरा है ना कुछ मेरा है
सब जिंदगी का जाल हैं,
सब जिंदगी का फेरा है ।

              प्रीति कुमारी 

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