मन घायल तन बिखरी

सिमटे हुए जिस्म से
घबराये से खड़ी थी वो
शायद किसी ने नोचा था
खुद से भी डरी डरी थी वो।


बदन में कपड़े लिपटे थे
पर अंग दिख रहा था उससे
वो निश्बद खड़ी थी पैरो पर
पर निर्जर बह रहे आंसू थे।

ऐसी सजा मिली उसको
जिसकी वो हकदार नही
तन की सुकून की ख़ातिर किया
बर्बरता उसके जिश्मो से।

जिसे समझते हो भोग विलास तुम
वो मान है एक नारी का
तेरी काया क्यों नहीं कल्पी
कुकृत्य कर्म कर जाने में ।

खुद तो नीचा गिरते हो
माँ -बाप को लज्जित करवाते हो
तुम किस कोलाहल से जीते हो कि
हैवानियत की सीमा पार कर जाते हो।

           प्रीति कुमारी 


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