जब आसमान भी अपना लगता था...**
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"टुन... टुन... टुन..."
एक धीमी सी बीप की आवाज़, फिर एक सफेद स्क्रीन पर अचानक उभर आता था नीला सा गोल लोगो... **"DD National"** का।
आज भी जब आंखें बंद करता हूँ, तो उस पुराने ज़माने की तस्वीरें एक-एक कर के सामने तैरने लगती हैं।
साल था 1990 का।
गाँव में सिर्फ दो-तीन घरों में ही टीवी हुआ करता था। और जिनके पास टीवी था, उनका घर किसी सिनेमा हॉल से कम नहीं लगता था। गर्मियों की छुट्टियों में जब हम ननिहाल जाते, तो पूरी गली के बच्चे एक ही घर में जुटते – जहाँ वो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी रखा होता।
Authored by: प्रीति ✍🏽
उस पर भी मनोरंजन का राज था — **"DD National"** का।
ना हज़ारों चैनल, ना ओटीटी की भरमार, सिर्फ एक ही आवाज़ — जो पूरे घर को जगा देती थी —
मुझे आज भी याद है, रोज़ शाम 7 बजे **"चित्रहार"** आता था। नई फिल्मों के गानों को देखने के लिए कैसे सब अपना काम छोड़कर स्क्रीन के आगे बैठ जाते थे। माँ रोटियाँ बेल रही होती, और कान टीवी की आवाज़ पर लगे होते।
और फिर...
रविवार की सुबह का क्या कहना!
**"महाभारत"**, **"रामायण"**, और **"शक्तिमान"**...
गली के बड़े-बुज़ुर्ग तक समय पर नहा-धोकर टीवी के सामने बैठ जाते।
उस वक्त टीवी देखना महज़ एक आदत नहीं थी,
**वो एक संस्कार था, एक पारिवारिक उत्सव जैसा।**
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कभी-कभी बिजली नहीं होती, तो सब मिलकर इंवर्टर से या बैटरी से टीवी चलाते — ताकि **"सुरभि"** या **"भारत एक खोज"** छूट ना जाए।
DD National पर सिर्फ मनोरंजन नहीं था,
बल्कि देश, संस्कृति, नैतिकता और ज्ञान था।
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आज जब हजारों चैनल और असीमित विकल्प हैं,
तो भी दिल वहीं अटका है — उस एक आवाज़ में...
जब टीवी ऑन करने से पहले ही ये अंदाज़ा हो जाता था कि
**"अरे DD चालू हो गया..."**
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**वो दिन, वो समय, वो साधारण-सा जीवन...**
जहाँ ना मोबाइल थे, ना वाई-फाई।
पर हर चेहरा मुस्कुराता था।
हर परिवार एक साथ बैठता था।
और टीवी की आवाज़ पूरे मोहल्ले में पहचान बन जाती थी।
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**आज की तेज़ दुनिया में वो धीमी-सी आवाज़ कहीं खो गई है।**
पर दिल के किसी कोने में अब भी गूंजती है —
* यह रही एक दिल को छू जाने वाली कहानी —
**"1990 का गांव और वो सादा जीवन"**
*(जहाँ हर सांस में सुकून था और हर दिन एक कहानी...)*
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**"1990 – जब ज़िंदगी सरल थी..."**
कहते हैं ना —
*"ना इंटरनेट था, ना मोबाइल... फिर भी हम connected थे।"*
और सबसे मज़बूत रिश्ता होता था — **अपने गांव से, अपने मिट्टी से।**
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### 🌾 **गांव की सुबह...**
सूरज उगते ही मुर्गे की बांग सुनाई देती थी।
बच्चे चटाई से उठकर खेतों की ओर भागते —
कोई नहर में नहाने जा रहा होता, तो कोई पापा के साथ हल जोतने की ज़िद कर रहा होता।
गांव के बुज़ुर्ग तुलसी के पास दिया जलाकर रामायण पढ़ते,
और मां आंगन में गोबर से लीपा हुआ चौका सजाती।
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### 👨🌾 **किसान का जीवन...**
उस समय खेती करना **एक पूजा** की तरह था।
ट्रैक्टर हर जगह नहीं होते थे —
कई जगह बैल से ही हल जोते जाते थे।
किसान सुबह जल्दी उठते, सिर पर गमछा, हाथ में फावड़ा लेकर खेतों में निकल जाते।
खुद मेहनत से बीज बोते, खुद पानी देते —
और जब पहली बार खेत में फसल लहराती,
तो आंखों में खुशी के आंसू भी होते थे।
खेती सिर्फ काम नहीं था —
**वो उनके जीने का तरीका था।**
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### 🏃♂️ **बचपन के खेल...**
1990 में बच्चों के पास न मोबाइल थे, न PS5,
फिर भी वो सबसे **खुश** थे।
* **गिल्ली-डंडा**
* **कंचे (गोली)**
* **छुपन-छुपाई**
* **पिट्ठू (सात पत्थर)**
* **भकभकउवा (भागने वाला खेल)**
* और हाँ, मिट्टी से बना क्रिकेट का बैट!
बच्चों को अपने खिलौने खुद बनाने आते थे —
पेड़ की टहनी से बंदूक,
और टूटी चप्पल से स्केट्स।
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### ☀️ **दोपहर का आलस...**
दोपहर में सब छांव में आराम करते।
दादी कहानी सुनाती —
राजा, रानी और भूत की कहानियाँ...
जो आज भी दिल में बसी हैं।
पंखे नहीं थे,
**हाथ का पंखा ही AC था**
और बगल में मटके का ठंडा पानी,
जिसे पीते ही आत्मा को ठंडक मिलती थी।
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### 🌙 **रातें — जब आसमान भी अपना लगता था...**
रात को सब छत पर सोते थे।
चांदनी में लेटकर तारे गिनना...
और तारों की ओट में सपनों को बुनना।
बिजली कभी-कभी जाती थी,
मगर अंधेरा डराता नहीं था,
बल्कि एक शांति देता था।
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### 💬 **और सबसे प्यारी बात...**
लोगों के पास वक्त था —
**बात करने का, साथ बैठने का, हँसने का।**
रिश्ते WhatsApp पर नहीं, दिल से निभाए जाते थे।
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**आज सब कुछ है — पर वो सुकून नहीं।
कभी-कभी लगता है, 1990 की वो ज़िंदगी...
धीमी थी, पर खूबसूरत थी।**
ना कोई दिखावा, ना कोई दौड़।
बस एक सीधी, सच्ची, मिट्टी से जुड़ी हुई ज़िंदगी।
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**क्या आप भी उस ज़माने में जिए हैं?
तो एक बार फिर से आंखें बंद करके महसूस करो —
वो धूल भरी दोपहर,
वो हाथ से बनाई पतंग,
और वो दिल से जुड़ी ज़िंदगी।** ❤️
---अमेरिका कैसे बना सुपर पावर 👇🏽👇🏽
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