Mahabharat Katha : महाभारत में कर्ण ने अंत तक क्यों नहीं छोड़ा दुर्योधन का साथ, रहस्य जानकर आप भी कहेंगे 'कलियुग में नहीं मिलता ऐसा योद्धा'

Mahabharat Katha : महाभारत में कर्ण ने अंत तक क्यों नहीं छोड़ा दुर्योधन का साथ, रहस्य जानकर आप भी कहेंगे 'कलियुग में नहीं मिलता ऐसा योद्धा'

Mahabharat mein Karn ne duryodhan ka Sath Kyun Diya : महाभारत कथा के अनुसार कर्ण दुर्योधन को अपना परम मित्र मानता था क्योंकि दुर्योधन ने कर्ण को हमेशा ही जाति, कुल से ऊपर उठकर एक योद्धा माना था। यही कारण था कि दुर्योधन के इतने बुरे काम करने के बाद भी कर्ण ने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा।

Authored by: प्रीति ✍🏽 

महाभारत में कर्ण का नाम एक ऐसे योद्धा के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने कौरवों के साथ युद्ध किया था लेकिन फिर भी अपनी कर्तव्यपरायणता, दानवीर होने के लिए कर्ण का नाम आज कलियुग में भी सम्मान के साथ लिया जाता है। कर्ण को दुर्योधन का परममित्र माना जाता है। कुंती और सूर्यदेव का पुत्र होने के बाद भी कर्ण को कई बार अपमान सहना पड़ा था क्योंकि कर्ण से जुड़ा यह रहस्य बहुत कम लोग जानते थे कि कर्ण शूद्र पुत्र नहीं बल्कि कुंती पुत्र हैं। महाभारत की कथा के अनुसार जब भीष्म पितामह  बाणों की शैय्या पर लेटे थे, तो कर्ण ने उन्हें यह रहस्य बताया था और तब भीष्म पितामह  ने अंत समय में एक उद्देश्य की पूर्ति की इच्छा को लेकर युद्ध करने के लिए कहा था। आइए, जानते हैं कि बाणशैय्या पर लेटे भीष्म ने कर्ण से क्या कहा था।

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कर्ण ने क्यों नहीं छोड़ा दुर्योधन का साथ। Photo:AI GENERATED 



✍🏽महाभारत युद्ध के 10वें दिन अर्जुन ने भीष्म पितामह को सर शैय्या पर लिटाया था



शिखंडी की मदद से अर्जुन ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर युद्ध के 10वें दिन भीष्म पितामह को बाणों से घायल करते हुए उनके लिए सर शैय्या बनाकर लिटा दिया था। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए इतना घायल होने के बाद भी भीष्म के प्राण उनके शरीर से नहीं निकले। भीष्म प्राण छोड़ने के लिए सूर्य उत्तरायण की प्रतीक्षा करने लगे। युद्ध का 10वां दिन समाप्त होने पर सभी योद्धा रणभूमि को छोड़कर अपने-अपने शिविर में वापस लौट गए। जबकि भीष्म पितामहा शर शैय्या पर आंख बंद करके लेट गए।

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✍🏽भीष्म से मिलने शर शैय्या पर पहुंचे कर्ण

कर्ण ने जब भीष्म पितामह की यह स्थिति देखी, तो वह भयभीत हो गए और उसी अवस्था में भीष्म के निकट जा पहुंचे। जिस समय वह वहां पहुंचे शर-शय्या पर लेटे भीष्म के नेत्र बन्द थे। उन्हें देखकर कर्ण की आंखें भर आई। भरे हुए कंठ से कर्ण ने भीष्म से कहा, "पितामह! आंखे खोलिए। आपको इस अवस्था में
देखकर मुझे बहुत दुख हो रहा है। कर्ण की बात सुनकर भीष्म पितामह ने धीर से आंखें खोलीं, और एकांत देखकर पहरेदारों को दूर हटाकर एक हाथ से कर्ण का उसी प्रकार स्नेहपूर्वक से अभिवादन किया। कर्ण को भीष्म की तरफ से इस स्नेह की आशा नहीं थी इसलिए कर्ण का दबा हुआ विद्रोह फूट पड़ा और उन्होंने कहा- "मैं वही राधापुत्र कर्ण हूं, जो सदा आपकी आंखों में गड़ा रहता था और जिसे आप सर्वत्र हेय दृष्टि से देखते थे।" यह बातें कहने के बाद कर्ण ने भीष्म को अपना सही परिचय देते हुए खुद को कुंती और सूर्यदेव का पुत्र होने का रहस्य बताया।


✍🏽भीष्म ने कर्ण को दी सीख

कर्ण की बात सुनकर भीष्म ने मुस्कुराकर कहा- "वत्स, तुम्हारे प्रति मेरे मन में कोई भी दुर्भाव नहीं है। तुम शूरवीर और महादानी हों। मनुष्यों में तुम्हारे समान कोई नहीं है। मैं सदा अपने कुल में फूट पड़ने के डर से तुम्हें कटुवचन सुनाता रहा। मैं जानता हूं कि तुम कुंती के पुत्र हो। पांडव तुम्हारे सगे भाई हैं। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो, तो अपने उन भाइयों से मिल जाओ। मैं चाहता हूं कि मेरी मृत्यु के द्वारा ही यह बैर की आग बुझ जाए और इस धरा के सारे राजा मिलकर रहने लग जाएं।

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✍🏽इस कारण से कर्ण ने हमेशा दिया दुर्योधन का साथ

भीष्म की बात सुनकर कर्ण ने मुस्कुराते हुए कहा- "आप जो कुछ कह रहे हैं। उसे मैं जानता हूं। मुझे अपने जन्म का रहस्य ज्ञात है लेकिन माता कुंती ने तो मुझे पानी में बहा दिया और एक सूत सज्जन ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया। मैं आरंभ से ही दुर्योधन से प्रीति रखता आया हूं क्योंकि उसने मुझे हमेशा सम्मान के भाव से देखा है। उसने मुझे एक योद्धा होने के नाते हमेशा ही सर्वोच्च माना है। मैंने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि तुम्हारा जो दुष्कर कार्य होगा, मैं पूरा करूंगा। दुर्योधन का ऐश्वर्य भोगकर मैं उसे निष्फल नहीं करना चाहता। जैसे श्रीकृष्ण अर्जुन की सहायता करते हैं, वैसे ही मैं भी हमेशा दुर्योधन की सहायता करना चाहता हूं।


✍🏽भीष्म ने कर्ण को इस उद्देश्य से युद्ध करने की आज्ञा दी

कर्ण ने कहा कि वे हर तरह से दुर्योधन का हित करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है। यह युद्ध तो होकर ही रहेगा, इसे कोई नहीं टाल सकता। मेरी इच्छा है कि मैं आपकी आज्ञा लेकर युद्ध करूं, इसलिए निवेदन है कि आप मुझे युद्ध करने की आज्ञा दें। मैंने क्रोध के आवेश में आकर अगर आपके साथ कभी भी कोई दुष्टता की हो, तो मुझे माफ करें। कर्ण को युद्ध के लिए कटिबद्ध देखकर भीष्म ने कहा, "कर्ण, यदि यह भयंकर बैर अब नहीं छोड़ा जा सकता, तो मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं, तुम स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से युद्ध करो।" इस पर कर्ण भीष्म पितामह को प्रणाम कर दुर्योधन के पास चले गए। इसके बाद दुर्योधन के प्रति कर्तव्यबद्धता का पालन करते हुए कर्ण अर्जुन के हाथों कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर मारे गए। जिस तरह कर्ण ने दुर्योधन की मित्रता के लिए केवल एक योद्धा के तौर पर युद्ध किया। कलियुग में ऐसे मित्र और योद्धा मिलना बहुत मुश्किल है।

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