एक मां का बेटा चला गया, लेकिन सवाल अभी ज़िंदा है...
अगर कोई दोषी था, तो अदालत थी, कानून था, संविधान था। फिर फैसला गोली ने क्यों सुनाया?
न्याय के नाम पर अगर अन्याय होगा, तो देश का हर जागरूक नागरिक सवाल पूछेगा। सत्ता की ताकत हमेशा के लिए नहीं रहती, लेकिन जनता की आवाज़ इतिहास लिखती है।
हम न्याय मांगते हैं।
हम जवाब मांगते हैं।
हम निष्पक्ष जांच मांगते हैं।
उनको भी फांसी मिलना चाहिए।
याद रखो,
जब अन्याय कानून बन जाए,
तो न्याय की मांग करना सबसे बड़ा कर्तव्य बन जाता है।
गूँज उठा बिलौटी का कोना, यह कलयुग की हुँकार थी,
सिस्टम की छाती पर बरसी, वो बागी सी तलवार थी !
हक की खातिर अड़ा रहा वो, मिटा नही वो स्वाभिमानी था, जुल्म के आगे झुका नहीं जो, वो मरद भरत तिवारी था !
देख हौसला उस बागी का, खाकी का भी दल डोल गया, लहू में उसके आज दोबारा, वीर भगत सिंह बोल गया !
लाख डराए खाकी तुमको, पर तुम्हारा लहू उबला था, अकेला ही था वो मर्द सूरमा, जो पूरी फौज से भिड़ा था !
मिटा न सकोगे उस चिंगारी को, जो सीनों में अब सुलग रही, भरत तिवारी की ये शहादत, अब क्रांति बनकर उबल रही !
इंकलाब का बीज बो गया, वो ऐसा इक तूफान था, शहीद होकर अमर हो गया, वो भारत का भरत था !
चला गया वो इस दुनिया से, पर हौसला छोड़ गया, अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज़्बा हर दिल में बो गया।
कुछ जख्म वक्त नहीं भरता, कुछ नाम कभी नहीं मिटते हैं, भरत जैसे लोग शरीर से जाते हैं, पर यादों में जिंदा रहते हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे और परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
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