" कसर इश्क़ का"

एक लड़का था आवारा सा 
मोहम्बतों का मारा सा, 
 जब साथ मिला मेरा उसको तो 
भूला दुःखद पल सारा था। 

 इंसान गठा था ईश्वर ने 
खुदा बनाया मेरा मन था, 
पर आदतों का मारा वो 
अपना पहचान दिखाया था।

 थी खलीस बहुत मुझको उससे पर
 भुला चुकी हूँ हर जख्मों को, 
 क्या तौलेगा जज़बातो की बेरहमी को 
जो सहा हृदय ने हर क्षण -क्षण था।
 
यादों की गहराई में हर लम्हा कैद है आज भी 
 अगर चला जाए जो जिंदगी से
 क्या जा सकता है यादों से।।
            
                                           प्रिती कुमारी

एक टिप्पणी भेजें

4 टिप्पणियाँ