एक कली खिली है आँगन में
सौहार्द्य -प्रेम से भरी हुई,

अफ़सोस की वो एक कन्या,
आँगन की शोभा बस बन के रहे।

जैसे -जैसे ये बढती गई
कई लोगों की नियत बीगड़ गई,
कितनो ने बांधा बेकार के रीत-रिवाजो में,
कई ने तो दायरे बना दिये ।

उसे उड़ना है, अपने सपनो को जीना है
लोगो की नियत से लड़ के,
कुछ कहेगे गंदी है, कुछ लोग बात बनायेगे
कोई फर्क नहीं पड़ता उसको,
बस उसे अपनी पहचान बनानी है,
लोगो कि सोच तो हैं ही ऐसी
हर बात मे बात बनाएंगे।

कितने दायरो में जकरोगे
कितने रूल बनाओगे,
ये तो जननी है, दे सकती हैं जन्म तुम्हें तो,
क्या करना इसके बस मे नहीं,

संस्कारो की झूठी बेड़ी में
तुने जान बूझ कर जकरा है,
तुमने अपनी कामनाओ की ख़ातिर
नारी जाति को दबाया है,

नारी शक्ति को ना आको तुम
यही दुर्गा,काली, नारायणी है, 
जब आएगी अपने रूप में तो, 
कोई भी कार्य मुमकिन कर दे ।

पुरुषों के बनाये सब दायरो को
एक दिन तोड़ना जरूरी है, 
तने हो नजरे लड़की की, 
लड़को की सोच बदलनी जरूरी है, 
कब तक सहेगी अबला बन, 
आवाज़ उठाना ही होगा, 
इन तुक्ष्य सोच के पुरूषो को
उनका लेबल दिखाना होगा।

ना कमजोर आकना नारी समझकर
हर राह में तुझे टक्कर देगी 
बेकार के संस्कारो में पर  ,
खुद की पहचान ना कभी खोने देगी, 
अपने हक  के  लिए लड़ना जानती है
नारी है कमजोर नहीं ।

                  प्रीति कुमारी