"सब पैसो का खेल है -अपना और पराया क्या"

सत्य की तालाश में असत्य को नकारते
शून्य की खोज में, ज्योति की तलाश में,
निकल पड़ा हूँ बेबाक सा,वक्त की तलाश में,
अपने परायो की परख को करीब से पहचानने ।

है कठिन डगर बहुत, हर तरफ भरा स्वार्थ है
समझ ना आ रहा अपने-परायो का फर्क जड़ा
हर कोई बस है स्वार्थ में जुड़ रहा हर धड़ी,
ये रास है वक्त का वरना हर कोई गैर हैं ।

धन -धान्य बना सकूं यही है सबकी मनोव्यथा
खिली रहे रौशनी से घर की हर संम्पदा,
मर रही हैं मानवता बढ़ रहा स्वार्थ है,
खो रही सभ्यता बढ़ रहा अंधविश्वास है ।

सबके दिल में हैं कालिक जमी,
चरण चल रहा है कलयुग का ,
हर कोई है सोचता, केवल अपना ही भला,
वक्त की आवाज़ ये वक्त से परवान है।

शैन्य -शैन्य बढ़ रहा हर किसी का स्वार्थ है
कोई नही अपना उन लाचार गरीबो का,
ना है उनकी पहचान कोई ना ही वो एक इंसान है
जो अपनो को भूल जाते है अपनो के बूरे वक्त मे।

वैसे संबंध को ना निभाना ही बेहतर है
जो जुड़े अच्छे वक्त से, छोड़ जाए बूरे वक्त में
समझ ना आ रहा अपनो -परायो का फलसफा ,
हर कोई है एक सा जब पड़ा है वक्त बूरा।

                                 प्रीति कुमारी 










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