"धड़ी अपनो से जुदाई की"

  भावुकता की प्रकाष्ठा का पल

  परम्पराओं की एक बेरी है, 

  बंन्धा संस्कृति की जंजीरो से

   स्तब्ध खड़ा सब देख रहा।


      सब लोग बेचैन है दर्शन को

      क्या दिया दहेज है पिता ने, 

      कोई देख सका ना उस बेचैनी को

      जो पिता के दिल को रौंद रही, 

       कि बेटी आज पराई हुई।

तिनका -तिनका कर जोड़ा था

पिता ने जीवन की कमाई को, 

बिन सोचे ही सब लूटा दिया

ताकि सम्मान मिले मेरी पुत्री को।

        कुछ लायक बनाकरके

        उच्चा पहचान दिलाकरके

        अपने सपनों को ना जीकर

        बेटी को पढ़ा लिखाकरके

        बिन कुछ सोचे सौप दिया, 

        परम्पराओं की जंजीरो में बंधकेे।

आसान नहीं होता यारो 

अपने जिगर के टुकड़े को


किसी और के ही सुपुर्द करना

तुम ना तौलना उसे दहेजो में 

एक पिता ने देदी है जिगर के टुकड़े को।

       सम्मान करो उस माता -पिता का

       जिसने दान किया है कन्या का

       अपने घर को सूना करके, 

        भर दिया है तुम्हारा घर-अंगना।।

 "बेटी बाबुल के दिल का टुकड़ा 

       कोई पिता देगा  और क्या"

                        प्रिती कुमारी



      

        

    

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