बचपन का अंगना छुट रहा,
एक कसक हो रही है दिल में
बाबुल का अंगना छुट रहा।
दिल जोड़-जोड़ से धड़क रहा
और तड़प -तड़प कर बोल रहा,
ना विदा करो इस आँगन से,
मेरा सारा अपना छुट रहा ।
कैसी नियम गढ़ी है विधाता ने
ये भावुकता भाव विभोर धड़ी,
कैसे रच दी है तूने प्रभु,
क्या बेटी ही थी सबसे कठोर प्रभु।
बचपन से पलकर जिस घर में
वो बड़ी हुई स्नेहो में,
एक नए रिश्तो के धागों से बंधकर
है छोड़ चली अपने बचपन की गली।
आँसू बेसूमार है निकल रहे
कोई भी ना रोक सका उस आँसू को,
ये कैसी परम्परा है प्रभु,
जिसमें बेबस केवल बेटी है,
ना चाह कर भी जाती हैं
बचपन की गलियों को भुलकर,
एक नई गली में बस जाती हैं,
फिर उसमे ही रम जाती हैं
उसे ही ताउम्र अपना बताती है।
विदाई के पल है बहुत भाव विभोर
बेटियों की दिल की धड़कन
रो-रो कर है सबसे कह रही
मुझे ना जाने दो किसी ओर
रहने दो मुझे इसी आँगन की शोभा
ना करो विदा मुझे बाबुल।
-प्रीति कुमारी

11 टिप्पणियाँ
Supper 👌👌👌👌👌
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंNice one जी
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंHar lrki ki yehi khani h...
जवाब देंहटाएंEk hi jnm me...
2 janmo ka farz nibhati h...
Esliye to larkiya hi ghar ki laxmi hoti h...
Bahut hard
जवाब देंहटाएंTnx every one
जवाब देंहटाएंThnx everyone
जवाब देंहटाएंJindgi kii sachi baate yhi hai..bahut sundar kavita hai
जवाब देंहटाएं👌👌👌👌
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