तुम कुप्रथा को ना ढ़ोओ माँ
मुझे आजाद गगन में उड़ने दो,
मैं भी तो तेरी लाडली हूँ माँ,
मुझे भी अच्छे से पढ़ने दो।
क्या होगा जो मैं पढ़ लुंगी
क्या होगा अगर अपनी इच्छा से जीउंगी
तुम भी तो दबी थी इसी कुप्रथा से
तुमने भी तो हर शौक गवाया था
मुझको तो आगे बढ़ने दो
अपने सपने को मुझमे जीने को।
लड़की हूँ तो क्या हुआ
तुम्हारे सारे अरमान पूरा करूगी
मुझमे तुम खुद को जीना माँ
उँचा पहचान मुझे दिला करके।
लोगों का क्या है,
ये तो हर बात में बात बनाएंगे,
परवाह ना करो तुम इनकी माँ
ये तो हर पल लड़की को ही दबाऐगे।
तुम ना दोगी साथ मेरा तो
कौन जहाँ में समझेगा
तुम भी तो कभी लड़की थी
हर मोड़ से तुम भी गुजरी हो
कब तक बढ़ाओगी कुप्रथा को
एक बार आवाज उठाओ ना
माँ हो तुम मेरी, एक महिला भी हो
खुल के लड़की का साथ निभाओ ना
तुमने खोया है अपने सपनो को
अब तो आवाज उठाओ ना
मेरे सपने को साकार बनाओ ना
लड़की हूँ तो क्या हुआ
मुझे भी पढना है, अपने सपनो के लिए
अपने इकलौता जीवन को
आजाद,स्वतंत्र अपनी इच्छा से जीने के लिए ।
-प्रीति कुमारी

4 टिप्पणियाँ
Awesome h
जवाब देंहटाएंThnku
जवाब देंहटाएंVery nice
जवाब देंहटाएंBahut badhiya ji
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