"सास नहीं माँ है आप"


सास बहू के झगड़े में 
एक बेटा पीसता जाता हैं 
क्यों भाग्य दोष तुम देती हो
ये तो कर्मों का लेखा -लेखी है ।

एक माँ ने है जन्म दिया
ममता के छावों में पाला है




संस्कार ओत-प्रोत कर भर दिया
तो दुजी माँ ने उसे निखारा है ।

सास -बहु तो बस एक शब्द है 
दुजी माँ मिलती है जीवन में 
जो स्नेह लुटाती हैं खुलकर
पर अफसोस की वो जब नराज हो
तो फर्क होता है जमकर।

जन्मदायनी का हक है जब
हर शब्द पर डांट लगाने का 
तो क्या कर्मदायनी माता को
कोई हक ही नहीं कुछ सुनाने का।

जिस पति को अपनाती हो
जिसे अपना कहकर जताती हो
उसको तुम्हारे लायक बना करके
उस माँ ने ही है तुम्हें सौप दिया।

सम्मान दो उस ममता को
जो बहु को अपना घर सौपती है 
एक अनजानी लड़की को अपना
पुत्र और धन सब दे देती हैं ।

सास है तो क्या हुआ 
वो भी तो ममता मुरत हैं 
तुम स्नेह लुटाकर तो देखो
भरपूर प्रेम तुम भी पाओगी।

तुम मां- सास में फर्क करना तो छोड़ो
माँ को बस माँ ही समझो
फिर चाहे मां पहली हो या दुजी
सारी काया क्लेष मिट जाएगी
  सास नहीं माँ है आप 
  ये हृदय शब्द बसा लो बस।

                                   -प्रीति कुमारी 


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