भगत सिंह की वीरता की ये कविता है वीर परम् आत्मा की

 
 भगत सिंह जैसे महान देशभक्त को हमारा देश भारत सदैव नमन करता रहेगा,उनका जन्म 28सितम्बर 1907 को बांधा जो पाकिस्तान का क्षेत्र में आता है वहाँ हुआ,  बाल्यकाल में ही जब वो जलियावाला कांड के जगह पर गए तो वहा की त्रासदी से वो भाव विभोर  होकर सोचने लगे कि आखिर कोई मनुष्य इतना धृणित अत्याचार कैसे कर सकता है, उस वक्त की सोच को दिल में रखे जब इस वीर जबान ने  अंग्रेजो को अपने भय देशप्रेम से भयभीत कर दिया ,इन्हें 23मार्च 1931 को फाँसी दे दी गई, ये दिन भारत देश के लिए बहुत दुखद दिन था परंतु इनके जाने से इनके विचारों की लहर दौर गई और कई वीर सपूत देशप्रेम में मरने मिटने को आक्रोशित हो गए ।
आज के इस पावन अवसर पर सारे देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ, तथा वीर सपूत को सत् सत् नमन🙏
 
आज की कविता उनके जीवन की क्षवि को दर्शाने का प्रयास हैं,उम्मीद करते हैं आप लोग साथ देगे,🙏

यूं ही आजादी नहीं पाई  हमने 
इसकी मोल कई वीरो ने चुकाई है 
जब चहुँ  दिशा अकुलाया था 
जलियावाला त्रासदी के कारण 
तब वीर जवानो का था खून खौला 
भूधरा पर परा लहू देख कर ।

दृढ़ संकल्पित होकर था वचन लिया
सबको  दांतो तले चने चबाउंगा, 
था उठ रहा उबाल उसके तन में 
ये वीर माँ का लाडला था।

उसने इन्कलाब की बोली से 
चहुँ  दिशा माचाया हहाकार था
अंग्रेजो को भय था इस वीर से
कांप रहा ब्रिटिश सौनिक दल था ।

जब छाई थी भारत पर गुलामी की छाया
जब मनुजता अंग्रेजो ने गवाई थी
खुले मुँह विभीषिका थी बोल रही
तब बजा डंका भगत सिंह का था।


चढ़ चुका था सम्मान बलि वेदि पर
लौह पुरुषों के दिल में थी आग लगी
सब मर मिटने को थे तैयार खड़े
 अपने पथ पर थे अडिग अरे।

अपमान का हलाहल घूँट पीते कैसे
वो वीर जवान थे, 
तो इस दीन दशा में जीते कैसे
हर वक्त लहक रही थी अग्नि में।

भगत सिंह की जवानी अँगड़ाई ली
आँखो में रोष,  गले में चीत्कार भरकर
वीरता ने छल दंभ को 
कर दिया जमी पर धराशाही।

तब अंग्रेज नशे मन टूटा था,जब भगत सिंह का लहूअग्नि ज्वाला सा फूटा था, 
चूमकर फांसी के फंदे को सो गया वो वीर
मां वसुधा के आँचल तले।

अपनी इस हुंकार से, एक हाहाकार को छोड़ गया 
वो वीर माता के सपूत ने, सब वीरो में जाकर भी
एक नई जवानी धोल गया।

मेरे भारत देश के वीर सपूतो
कुछ सीख लेना, इस देश प्रेमियो से
जब  हो रहा हो जीवन सिसक कर रूद्द 
हो जीवन का पथ अवरूद्ध 
तब भरना अपने मन में वही सोला
जो भिरूता नहीं, वीरता को हो परिशुद्ध ।

                                   -प्रीति कुमारी 



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