"जमाने के देखे है रंग हजार"

ह मैं हूँ तन्हा भरी महफ़िल में
क्योंकि किसी का साथ नहीं,
वक्त हैं गरदीस में, क्योंकि
अमीरी जैसी हालात नही।

कहते हो पैसा -पैसा करती हो
कौन पहचानता है बिन पैसो के,
ये दुनिया बहुत मतलबी है जनाब
जड़ा गीर तो जाओ,
अपने -अपने ना रहेगे
पल भर में दिखाऐगे अपनी औकाद।

औकाद बनानी है अपनी भी
पहचानते है लोग औकाद देखके,
ये बड़ी अजीब दुनिया है साहब
पैसे वाले की गलत बात भी सही
और जिनका वक्त बूरा हो उनकी
सही बात भी चुभती है अपनो को।

अपनो - परायो का फलसफा
सब एक बात पे अटक जाती हैं,
हो बुलंद तकदीर तो एक्का और पासा दोनों अपना
ना तो बने बनाए रिश्ते भी
खाक में मिल जाते है ।

या खुदा ऐसे रिश्तो से दूर ही रखना
ना हो तकदीर तो मजबूर ही रखना,


देना हिम्मत जो बना सकू पहचान अपनी, 
बस ना मिलाना उसके बाद 
मतलबी रिश्तेदार कभी ।

जो छोड़ जाए तन्हाई में तन्हा 
वो यार-दोस्त, रिश्तेदार कैसा, 
भूला दे वक्त की गरदीस में और
अच्छे वक्त में दिखाए अपनापन 
वो अपना कैसा, वो रिश्ता कैसा।

"हाँ मैं हूँ तन्हा अगर यार-दोस्त रिश्तेदार ऐसे हो तो ना चाहिए अपनापन अगर अपने ऐसे हो तो, 
अकेला ही खुश हूँ बेकार के जंजालो से"

            प्रीति कुमारी 




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