"बेरोजगारो की आवाज़"

बेबस हूँ लाचार हूँ, 
साथ ही साथ बेरोजगार हूँ, 
इतना पंगु बना दिया है व्यवस्था ने
टूट रहा आत्मविश्वास है ।

संघर्ष छिड़ा हैं उम्मीदो से 
इसका विराम अब मुश्किल है, 
संघर्ष नित्य रूप बढ़ायेगा 
ये विकराल रंग दिखाएगा ।

या तो बदलेगी व्यवस्था
या युवाओ का वोट हाथ से जाएगा, 
बहुत हुई नारे बाजी, 
अब वक्तव्य नहीं  ,
धरातल पर कार्य चाहिए, 
हां अब हम युवाओ को इंसाफ चाहिए ।

 वर्षो -वर्ष बीत रहे 
 एक इक्जाम  की उम्मीद में, 
 कितने कीमती वक्त गुजर गए, 
रोजगार की उम्मीद में ।





चल  सकती हैं मैटरो, बसे 
हो सकती हैं चुनाव सही वक्त पर, 
तो क्या करोना की मार बनी है केवल
सरकारी इक्जाम के पथ पर।

संघर्ष छिड़ा हैं थक करके
सिस्टम की व्यवस्था के निराशा से, 
बदलाव चाहिए व्यवस्था में, 
ये संघर्ष छिड़ा हैं उम्मीदो पे।

बार -बार कोरोना की 
आर में छुपा ना कीजिए, 
हो सकते है चुनाव तो, 
युवाओ को भी इक्जाम का मौका दीजिए ।

इससे पहले कि लोकतंत्र की
लोकतांत्रिक व्यवस्था दिखा दे, 
और युवा का आक्रोश आपकी
सत्ता हिला दे, बेबस हूँ लाचार हूँ, 
साथ ही साथ बेरोजगार हूँ ।

                         प्रीति कुमारी 
 

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