हकीक़त

बात हकीक़त की ना कर
तेरे फ़ितरत से तो वाकिफ मैं भी हूँ ,
मुझे ना समझा अपनी दरियादिली
तेरे साथ हूँ वर्षो से ,तुझसे वाकिफ भी हूँ ।



चुपचाप स्तब्ध खड़ी देखती हूँ हरपल
कोई हक नहीं, कोई प्रश्न नहीं 
कोई ना पुछता तेरा विचार क्या है, 
कोई ना कहता बता जड़ा जो तेरे, 
अपने स्वतंत्र जज़बात है।

ना मायका ना ससुराल है महिला का
दिल जो मायके से जुड़ी है, 
जिदंगी तो ससुराल से, 
दोनो को ही मानती ये अपने
जिदंगी और दिल की कड़ी, 
क्या कोई है समझता इसकी दिल की खलीस।

तेरी हर बात सुन रही है वर्षो से
क्या तुमने कभी सोचा है एकपल,
तेरे लिये सारे तकलीफ है झेलती 
क्या तुमने कभी साझा किया इसकी खलीस।

रोटी, कपड़ा ,मकान ही सब नहीं 
जो तुमने देकर सोचा बहुत किया है मैने तेरे लिए, 
ये महिला  है बहुत कुछ नहीं, 
अपनी स्वतंत्रता है मांगती
अपनी इज्जत हैं चाहती, 
एक प्रेम सौहार्द्य की इसे चाह है ।

तुम जिम्मेदारी ही ना निभाओ केवल
सम्मान भी है  मांगती दो बराबरी का सम्मान 
हर समस्या मे हो इसके अपने विचार, 
ये ना दिखाओ की बहुत दिया  है तुने ,
जो दिया उससे ज्यादा वापस किया है इसने।

फर्क है तुझमे -उसमे , तुमने बस दिया है,
उसने हर पल सम्मान से दिया है, 
बात बस सम्मान की है तुममे-उसमें
बाकी ना दिखा अपनी दरियादिली मुझे 
वर्षो से हूँ साथ तेरे यकीनन तेरी
फ़ितरत को तेरी हकीकत को हूँ पहचानती।

                                       -प्रीति कुमारी 










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