बचपन नादान सा नाजुक था
बिन सोचे ही तुमने ब्याह दिया
अपना दायित्व निर्वाहने को।
बापू तूने कभी सोचा ही नही
मेरे बालपन के लड़कपन को
समय से पहले ब्याह कर
तूने छीन लिया मेरे बचपन को।
उम्र हुई थी इतराने -बलखाने को
कंधे तेरे बैठ के बापू शैर-सपाटा जाने को
तूने बालपन की किलकारी को
सिंदूर के भारी बंधन में बांध दिया
बापू तूने मेरे बचपन को
अपने दायित्व की सूली पर चढा दिया।
बापू बल बल बलखाती हूँ
बिलख-बिलख रो जाती हूँ
नही संभलती चूड़ी -बिंदिया
साड़ी में लिपट कर गिर जाती हूँ ।
कुछ समझ नहीं आता बापू
लोगों के ताने बाने सुनकर
बस सब मुझपर चिल्लाते है
हर बात में खड़ी -खोटी सुनाते हैं ।
क्या करूं, क्या ना करूं बापू
अब तुम्ही आके समझा जाओ
अभी भी जिन्दा हूँ बापू
अपनी गुड़िया को बुलवा लाओ।
कुछ पल तो छावों में अपने रख लो
कुछ पढ़ा लिखाकर सम्मान दिला दो
थोड़ी ब्याह सी उम्र हो जाए तो
बिदा कर देना अपने छत्र-छाया से बाबूल
इतना भी क्या है बाबुल, मैं भी तो तेरी गुड़िया हूँ
ना करो अन्याय मेरे जीवन से बापू
मेरा तो अभी नादान -नाजुक-लड़कपन है ।🙏
🙏बाल विवाह ना करे, लड़कियों को पढने दे बढ़ने दे, सम्मान जब आप माँ -बाप होकर नहीं दिलाऐगे तो ससुराल वाले से क्या उम्मीद रखेगे🙏
-प्रीति कुमारी


4 टिप्पणियाँ
Nice
जवाब देंहटाएंNice 👌👌👌👌
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