"मुहब्बत के झूठे अफसाने"

बेदर्द जमाने में,
तकल्लुफ की जरूरत क्या
हर मोड़ पे कोई तन्हा है 
हर राह पर है कोई गुमा।

पल भर की जुदाई में
आंसू की धारा ने बह-बहकर
तकिया को भिगोया  है
और मुझे बेबस है किया ।

मुहब्बत रूह में बस गई थी
किया रूसवा इसे तुमने
भरी महफ़िल की उम्मीद दिला
भरी महफ़िल में तन्हा किया तुमने।

किया जो सोच कर तुमने
तेरी फ़ितरत ही काली थी
तेरी आँखों में दिखने वाली
मुहब्बत भी इसी काबिल थी।

गमे इश्क़ में दागदार हो गए
हमने तो कि थी सच्ची मुहब्बत
पर हमी इस मुहब्बत में
तन्हा और लाचार हो गए।

यादों की लड़िया बसी हैं मेरे
 मन के रोम -रोम प्रतिक्षण में 
लगी है आज भी उम्मीद 
तेरे लौट आने कि जीवन में ।

                              -प्रीति कुमारी 




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