"महफिल सजी थी फिर भी अकेला मै था "

खुदा बता जरा तू चाहता है क्या
हर वक्त कर रहा अकेला मुझे
तेरी रजा है क्या
खुदा मेरी खता है क्या ।

बड़ी महफिल में सजी थी सारी रौनके
था हर कोई मसगूल उस रौनक तले
तन्हा खड़ी थी मैं तन्हाईयों में पड़े।


बेखौफ तू इल्जाम लगाता चला गया
मसूमियत को मेरे बहाता चला गया
मै थी तेरी मुहब्बत के आगोश में
और तू इसका मजाक बनाता चला गया ।

कभी तो सोच अपने आदतों को
बेरूखी का एहसास तो कर जड़ा
तुझे तेरे बेरूखी की तलाश होगी
फिर तुझे मेरी तन्हाई की गहराई महसूस होगी।

वक्त आज है बूरा मेरा
हूँ अकेली और तन्हा
पर बेसक वक्त मेरा भी आयेगा 
हरतरफ होगा एक दिन नाम अपना।

                                   -प्रीति कुमारी 



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