अनकही दास्ता

अनकही दास्ता, 
ये जज़बातो की अंगराई है 
उमर -धुमर रहा है दिल में
मुस्कान बनकर चेहरे पर आई है ।

तेरी आँखों की कसीस 
दिल में उतर आई है 
तेरे मुस्कान की क्षवि 
रोम-रोम में समाई है ।



है ये अनकही दास्ता दिल की
जो तेरे ख्वाबो में पल रही 
तेरे पलकों में समाई है 
ये कसीस हैं तेरी आँखों की 
जो  मेरे चेहरे पर मुस्कान बनकर छाई है ।

कल देखा था तुझे 
बड़ी कयामत लग रही थी 
निगाहे तब से बेचैन है दर्शन को 
दीदार करने, तेरी कसीस में डूबने को।

तेरी मुहब्बत की कसीस 
मेरे दिल में बस गई है 
कह दूं तुझे या ना कही
ये असमंजस मन में बन आई है 
है ये मेरी अनकही दास्ता
पर तेरी कसीस आँखो में समाई है ।

                               -प्रीति कुमारी 



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