सबने बस उतना ही जाना है मुझे

तु समझ सका मुझे बस उतना
जितनी तुझे मुझसे जरूरत थी
क्या अच्छा, क्या बूरा था मुझमे
ये परखने की तुममे कहाँ हैसियत थी।

थोड़ी झल्ली हूँ, पर बेबाक बोलती हूँ
अपनी कट जाए,पर किसी का ना काटती हूँ
तेरी नजरों में बूरी हूँ,या तेरी नजरे ही बूरी हैं
तु खुद जानता है, बेसक पहचानता है ।

सबने बस उतना ही जाना है मुझे

सच कहने की हुनर है मुझमे
चाहे अंजाम कठिन ही हो
सच्चा, पक्का बोलने वाला
इस जग के लिए  बूरा ही है
हर पल अकेला खड़ा ही है ।

भूल हुइ सो मेरी ,
अच्छाई तेरी हो जाती
क्या खूब करिश्मा है जग का
जो भला सो तेरा,
जो बूरा सो मेरा हो जाता।

सबने मुझे  उतना समझा
जितनी जिसकी कामना
आक दिया बस यही बेस पर
मैं बूरी ,मेरी चाल बूरी,
व्यवहार बूरी, हरबात बूरी
जैसे ही खत्म हुई हर कामना।

प्रीति कुमारी




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