बेहद खास बनाने आती है
प्रयास जिसका तगरा था
उसे मुकाम दिलाने आती है ।
नई उर्जा का संचार लिए
नभ उजाले से जगमगाता है
तुम उठो दृढ़ संकल्प लिए
जैसे की आज तुम्हारा हैं ।
थककर, गिरकर, विश्राम किये
रात गई उस उलझन में
ये नई सुबह की प्रतिभा हैं
चलो आज एक और नई शुरूआत करे।
गिरकर उठना, उठकर गिरना
ये मानव की जीवन लीला है
जो रूक गया इससे हारकर
वही यहाँ विफलता झेला हैं ।
डट जाए राह पर चट्टानों सा
हो दृढ संकल्प जिसका सूरज सा
करे नित्य कठिन परिश्रम जो
रूक सके ना सफलता उसके जीवन में ।
प्रीति कुमारी

3 टिप्पणियाँ
Nice 👌👌👌❤️❤️
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छी कविता है।
जवाब देंहटाएंNice👌👌👌👌
जवाब देंहटाएं