तेरी आरजू बस मुझ तलक ही है

ना कर ब्या की आरजू तेरी
बस मुझ तलक ही है
कल देखा मैने तुझको
गैरो की बाहों में ।

ये फलसफा होता काश!
मेरी आँखों का धोखा होता काश!
भले तू होता गैरो का
पर तु केवल मेरा हैं
ऐसा गुमा होता काश!

ना टूट कर भी टूट गई
तेरे सपनो से ज्यादा तो
यकीन टूटा हैं,दुआ तो बस यही है अब
कुछ आ जाए वापस तो आए
पर यकीन दुबारा कभी ना आए।


यही दुआ है तेरी कटती रहे
जिंदगी और दिल्लगी सलामती से
मैं तो टूट ही चुकी हूँ तेरे दिये जख्मों से
धोखा वो भी ना खाए कही
तेरे इश्क़ की चालबाजी हुनर से।

ना कर बयां की आरजू तेरी
बस उसपे ही खत्म है
तू बहता दरिया सा है जालिम
तेरा कोई किनारा ही नहीं है ।

प्रीति कुमारी



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