जुबा मौन हैं पर मन अशांत है

एक बात कहूं,
चुप हूँ शब्दों से पर मन अशांत है
कोई समझता कहाँ है हमे
चाहत हूँ सबकी,चाहिए हूँ सभी को
पर सम्मान कहाँ है हमारी ।

कुछ वस्तु सी उपयोगी हूँ
सब दर्द सह सकती हूँ
पर कुछ कह नहीं सकती
नारी हूँ चुप रहू, मन कि ना करू
संस्कार कि बेरी में हूँ हरपल बंधी।


पहले तो बांधी जाती हूँ संस्कारो से
निकल लू इस ढोंग स्वांग से तो
कुछ भी कर ना सकू अपने मन की
नारी हूँ ना सह सकती हूँ, कह नहीं सकती।

अपने मन कि करू तो मनचली हैं
चुप रहू तो सभ्य कहलाउ
अन्याय सहूं तो संस्कारी हूं
जो कर लू अपने मन की जड़ा
सबकी नजरो में फिर हुई बला ।

पढना सही नहीं, पढ़ लू अगर तो
सही -गलत पर कुछ फर्क करना गलत
तुम क्यों बोलती हो चुप रहो
लोग क्या कहेगे,
लड़की हो लड़की की तरह रहो
नारी हूँ ना सह सकती हूँ
पर कह नहीं सकती
चुप हूँ जुबा से पर मन अशांत है ।

प्रीति कुमारी







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