जिंदगी की चाह -2

   ❤ "जिंदगी की अनसुलझी पहेली"❤

ये जिंदगी क्या इस्तफाक है
कदम कदम पे तेरा साथ है, 
सागर के लहरों सी, 
प्रज्वलित अग्नि की लौ -सी।


हर कदम है कई चुनौतियां 
इसको हर वक्त सुलझाती है, 
ये जिंदगी तू क्या चाहती है
क्यों ये समझ ना आती हैं ।

एक ताश के पत्तो सा बिछा हूँ 
जीत -हार, नहला -दहला ,
सब तू चलती है, 
मैं बस चल रहा हूँ कदम मिला,
तू साथ हर वक्त है।

इंतजार, इनकार, इकरार, बेकरार 
सब दाव-पेंच है, 
जीने का सलीखा -सबब है 
बस चले हर वक्त तेरी मनमानी, 
हमसब बस तेरे हाथों के कठपुतली हैं ।

बड़ी हलचल सी होती हैं 
भविष्य की परछाई सोचकर, 
क्या भला क्या बुरा,
सब तेरे हाथों में पड़ी हैं, 
तू साथ  है हर पल ये जिंदगी, 
क्यों चुनौतियों से भरी हर घड़ी है।।

  ये जिंदगी कुछ चाहिए मेरी चाहते कुछ और भी  है।।
  एक वक्त था जो गुुुुजर  चुका  वो कल था
  जो  गुजर  चुका  ये जो आज  है,
  वो चाहिए येे जिंदगी तेरी चाह  है।।

                            प्रीति कुमारी


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